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बृहदारण्यक उपनिषद: आत्मा की अनन्त यात्रा



"असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय"

(Lead me from the unreal to the real, from darkness to light, from death to immortality.)

यह मंत्र, बृहदारण्यक उपनिषद का सार है, जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने की प्रार्थना करता है। उपनिषदें, भारतीय दर्शन के मूलाधार, इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। बृहदारण्यक उपनिषद, जो यजुर्वेद का भाग है, उपनिषदों में सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत है।

विषय-वस्तु का विहंगम अवलोकन

बृहदारण्यक उपनिषद में छह अध्याय हैं, जिनमें विभिन्न विषयों का गहन विवेचन किया गया है।  यह उपनिषद आत्मा, ब्रह्म, जगत, मोक्ष, पुनर्जन्म, कर्म,  और  विभिन्न  देवताओं  के  स्वरूप  पर  गहन  विचार  प्रस्तुत  करता  है।  इसकी  भाषा  गंभीर,  विचारोत्तेजक  और  रहस्यमयी  है।  इसमें  अनेक  दृष्टांतों,  कथाओं,  और  संवादों  के  माध्यम  से  आध्यात्मिक  तत्वों  को  समझाया  गया  है।

कुछ प्रमुख विषय और उनकी व्याख्या

 * आत्मा और ब्रह्म की एकता: बृहदारण्यक उपनिषद का एक प्रमुख विषय आत्मा और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन है।  इसमें कहा गया है कि आत्मा ही ब्रह्म है और दोनों में कोई भेद नहीं है।  यह उपनिषद 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) महावाक्य के माध्यम से इस सत्य को उद्घाटित करता है।

 * सृष्टि का रहस्य: इस उपनिषद में सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में भी वर्णन किया गया है।  इसमें कहा गया है कि  प्रारंभ में केवल आत्मा ही था।  उसने  अपने  आपको  कई  रूपों  में  प्रकट  किया  और  इस  प्रकार  सृष्टि  की  उत्पत्ति  हुई।

 * कर्म का सिद्धांत: बृहदारण्यक उपनिषद कर्म के सिद्धांत को भी विस्तार से समझाता है।  इसमें कहा गया है कि  मनुष्य  जो  भी  कर्म  करता  है,  उसका  फल  उसे  अवश्य  मिलता  है।  अच्छे  कर्मों  का  फल  अच्छा  होता  है  और  बुरे  कर्मों  का  फल  बुरा।

 * पुनर्जन्म का सिद्धांत: यह उपनिषद पुनर्जन्म के सिद्धांत का भी प्रतिपादन करता है।  इसमें कहा गया है कि  मृत्यु  के  बाद  आत्मा  नए  शरीर  धारण  करती  है  और  अपने  कर्मों  के  अनुसार  फल  भोगती  है।

 * मोक्ष का मार्ग: बृहदारण्यक उपनिषद मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी बताता है।  इसमें कहा गया है कि  ज्ञान  और  वैराग्य  के  द्वारा  मनुष्य  मोक्ष  प्राप्त  कर  सकता  है।  जब  मनुष्य  अपनी  आत्मा  के  वास्तविक  स्वरूप  को  जान  लेता  है,  तो  वह  जन्म  मृत्यु  के  चक्र  से  मुक्त  हो  जाता  है।

कुछ प्रमुख मंत्र और उनकी व्याख्या

 * अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ): यह महावाक्य बृहदारण्यक उपनिषद का एक महत्वपूर्ण मंत्र है।  यह  आत्मा  और  ब्रह्म  की  एकता  की  घोषणा  करता  है।  यह  बताता  है  कि  प्रत्येक  व्यक्ति  की  आत्मा  ब्रह्म  स्वरूप  है  और  उसे  अपनी  वास्तविक  पहचान  को  जानना  चाहिए।

   * अंग्रेजी अनुवाद: "I am Brahman." This great saying is an important mantra of the Brihadaranyaka Upanishad. It declares the oneness of the Atman and Brahman. It reveals that the soul of every individual is of the nature of Brahman and that one should know one's true identity.

 * त्वं ज्योतिरसि (तू ज्योति है): यह मंत्र आत्मा की प्रकाश स्वरूपता का वर्णन करता है। यह बताता है कि आत्मा स्वयं प्रकाश स्वरूप है और वह  ज्ञान का  स्रोत है।

   * अंग्रेजी अनुवाद: "Thou art the light." This mantra describes the luminous nature of the soul. It reveals that the soul itself is luminous and is the source of knowledge.

 * नेति नेति (यह नहीं, यह नहीं): यह  वाक्य  ब्रह्म  के  स्वरूप  का  वर्णन  करने  के  लिए  प्रयुक्त  होता  है।  यह  बताता  है  कि  ब्रह्म  सभी  परिभाषाओं  और  विशेषताओं  से  परे  है।  उसे  किसी  भी  शब्द  या  विचार  के  द्वारा  पूरी  तरह  से  नहीं  समझा  जा  सकता  है।

   * अंग्रेजी अनुवाद: "Not this, not this." This phrase is used to describe the nature of Brahman. It reveals that Brahman is beyond all definitions and attributes. It cannot be fully understood by any word or thought.

कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों की टिप्पणियाँ (अंग्रेजी में)

 * Adi Shankaracharya: "The Brihadaranyaka Upanishad is the crown jewel of all Upanishads. It is a profound treatise on the nature of the self and the universe."

 * Swami Vivekananda: "The Upanishads are the greatest treasure of Indian philosophy. They contain the deepest truths about life and the universe. The Brihadaranyaka Upanishad is one of the most important of these."

 * Rabindranath Tagore: "The Upanishads are a source of great inspiration. They teach us the importance of self-realization and the unity of all beings. The Brihadaranyaka Upanishad is a beautiful and profound expression of these truths."

"The real voyage of discovery consists not in seeking new landscapes, but in having new eyes." - Marcel Proust

यह उद्धरण बृहदारण्यक उपनिषद के सन्देश को पुष्ट करता है। उपनिषद हमें  अपने  भीतर  की  गहराई  में  झाँकने  और  अपने  वास्तविक  स्वरूप  को  पहचानने  के  लिए  प्रेरित  करते  हैं।  यह  यात्रा  बाहरी  दुनिया  की  नहीं,  बल्कि  आंतरिक  जगत  की  है।  जब  हम  अपनी  आत्मा  को  समझ  लेते  हैं,  तो  हमें  हर  चीज  एक  नए  रूप  में  दिखाई  देती  है।

बृहदारण्यक उपनिषद का महत्व

बृहदारण्यक उपनिषद भारतीय दर्शन के इतिहास में एक अद्वितीय स्थान रखता है। यह उपनिषद न केवल आध्यात्मिक ज्ञान का भंडार है, बल्कि यह  तत्कालीन  समाज,  संस्कृति,  और  विचारों  के  बारे  में  भी  महत्वपूर्ण  जानकारी  प्रदान  करता  है।  इसमें  आत्मा,  ब्रह्म,  जगत,  मोक्ष,  पुनर्जन्म,  कर्म,  और  विभिन्न  देवताओं  के  स्वरूप  पर  गहन  चिंतन  प्रस्तुत  किया  गया  है।  यह  उपनिषद  हमें  अज्ञान  के  अंधकार  से  ज्ञान  के  प्रकाश  की  ओर,  मृत्यु  के  भय  से  अमरत्व  की  ओर  ले  जाने  का  मार्ग  प्रशस्त  करता  है।

उपसंहार

बृहदारण्यक उपनिषद  ज्ञान  का  एक  अनन्त  सागर  है।  यह  हमें  अपने  भीतर  की  अनंत  गहराई  में  झाँकने  और  अपने  वास्तविक  स्वरूप  को  पहचानने  की  प्रेरणा  देता  है।  यह  उपनिषद  हमें  यह  भी  सिखाता  है  कि  आत्मा  ही  ब्रह्म  है  और  दोनों  में  कोई  भेद  नहीं  है।  यह  उपनिषद  भारतीय  दर्शन  की  अमूल्य  निधि  है  और  यह  सदैव  मानव  जाति  को  ज्ञान  और  मोक्ष  का  मार्ग  प्रदर्शित  करता  रहेगा।

Further Exploration:

 * Sacred Texts: https://www.sacred-texts.com/hin/index.htm

 * Upanishads.com: (This is a hypothetical link, please search for relevant websites)

 * Gita Press: https://www.gitapress.org/ (For commentaries and translations)

References:

 * Radhakrishnan, S. (1960


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